1. Hindi News
  2. मनोरंजन
  3. बॉलीवुड
  4. रियल लाइफ में कौन हैं Bharat Bhhagya Viddhaata की नर्स? आतंकियों की बंदूकों के आगे बनीं ढाल, बचाई थी 20 प्रेग्नेंट महिलाओं की जान

रियल लाइफ में कौन हैं Bharat Bhhagya Viddhaata की नर्स? आतंकियों की बंदूकों के आगे बनीं ढाल, बचाई थी 20 प्रेग्नेंट महिलाओं की जान

 Written By: Jaya Dwivedie
 Published : Jun 12, 2026 02:23 pm IST,  Updated : Jun 12, 2026 02:47 pm IST

'भारत भाग्य विधाता' सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। फिल्म में कंगना रनौत अंजलि कुल्थे के रोल में नजर आ रही हैं। फिल्म की कहानी रियल लाइफ किरदार पर है, ये कौन हैं, जानें।

Kangana Ranaut anjali kulthe- India TV Hindi
कंगना रनौत और अंजलि कुल्थे। Image Source : IMDB, ANI

26 नवंबर 2008 की वो रात कोई भी हिंदुस्तानी कभी नहीं भूल सकता, जब मुंबई की सड़कों और इमारतों पर मौत तांडव कर रही थी। उस आतंकी हमले के जख्म आज भी हरे हैं। जब भी 26/11 का जिक्र होता है तो अमूमन ताज होटल या नरीमन हाउस की तस्वीरें आंखों के सामने तैरने लगती हैं। लेकिन इस भयानक त्रासदी के बीच मुंबई के कामा अस्पताल में भी एक जंग चल रही थी, निहत्थे लोगों की बंदूकधारियों के खिलाफ जंग और सबसे बड़ी बात, जिंदगी को बचाने की जंग। अब इसी अनसुनी और जांबाज कहानी को लेकर एक्ट्रेस कंगना रनौत अपनी नई फिल्म 'भारत भाग्य विधाता' के जरिए बड़े पर्दे पर आ रही हैं। यह कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से नहीं निकली, बल्कि यह दास्तान है कामा अस्पताल की एक असल जन-नायक, नर्स अंजलि कुल्थे की, जिन्होंने मौत के साये में रहकर फर्ज की एक ऐसी इबारत लिखी जो आज भी हम सबको प्रेरणा देती है।

जब एक आम शिफ्ट बन गई कयामत की रात

26 नवंबर की शाम अंजलि कुल्थे के लिए किसी भी दूसरी शाम जैसी ही थी। वे रात 8 बजे कामा और एल्ब्लेस अस्पताल में अपनी 12 घंटे की नाइट शिफ्ट के लिए पहुँची थीं। उस वक्त उनके वार्ड में 20 गर्भवती महिलाएं भर्ती थीं, जिनकी जिम्मेदारी अंजलि के कंधों पर थी। रात के सन्नाटे में अचानक गोलियों की तड़तड़ाहट गूंजी। अंजलि ने जब खिड़की से बाहर झांका तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। भारी हथियारों से लैस दो आतंकवादी अस्पताल के परिसर में घुस चुके थे और उन्होंने वहां तैनात वॉचमैन को गोली मार दी थी। पल भर में इलाज का वो मंदिर जंग का मैदान बन चुका था। चारों तरफ चीख-पुकार और दहशत का माहौल था। ऐसे में अंजलि के पास दो रास्ते थे या तो वह अपनी जान बचाकर कहीं छिप जातीं या फिर अपने मरीजों के लिए ढाल बन जातीं। उन्होंने दूसरा रास्ता चुना। अंजलि ने बिना वक्त गंवाए फुर्ती से वार्ड के सारे दरवाजे अंदर से बंद किए और डरी हुई गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित कोनों में छिपाना शुरू कर दिया। बाहर ग्रेनेड फट रहे थे, दीवारें हिल रही थीं, लेकिन अंजलि चट्टान की तरह खड़ी थीं।

मौत के साये में गूंजी नई जिंदगी की किलकारी

इसी खौफनाक माहौल के बीच अंजलि के सामने एक ऐसी चुनौती आई जिसने उनकी परीक्षा को और कड़ा कर दिया। वार्ड में भर्ती एक गर्भवती महिला को, जो पहले से ही हाई ब्लड प्रेशर से जूझ रही थी, अचानक तेज प्रसव पीड़ा (लेबर पेन) शुरू हो गया। हालात बेहद नाजुक थे, जरा सी भी देरी मां और बच्चे दोनों की जान ले सकती थी। लेकिन दिक्कत यह थी कि सुरक्षित डिलीवरी के लिए उन्हें ऊपरी मंजिल पर बने लेबर रूम में जाना था। उस वक्त लिफ्ट का इस्तेमाल करना मौत को बुलावा देने जैसा था और कॉरिडोर में गोलियां चल रही थीं। अंजलि ने डर को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने उस बेबस मां का हाथ थामकर ढांढस बंधाया और बेहद सावधानी से सीढ़ियों के रास्ते ऊपर ले जाने लगीं। हर कदम पर मौत का खतरा था। अंजलि कहती हैं, 'उस वक्त मेरे मन में बस एक ही बात चल रही थी कि इस मां और बच्चे को कुछ नहीं होना चाहिए।' आखिरकार वे लेबर रूम पहुंचीं, डॉक्टरों की मदद से एक स्वस्थ बच्चे ने जन्म लिया। इसके तुरंत बाद अंजलि आराम करने के बजाय वापस नीचे आईं और सुबह होने तक उन्होंने अपनी देखरेख वाली सभी 20 महिलाओं को सुरक्षित बचा लिया।

पिता से मिली वर्दी के फर्ज की प्रेरणा

अंजलि से जब बाद में पूछा गया कि उस खौफनाक रात उन्हें डर क्यों नहीं लगा तो उनका कहना था कि जब वे अपनी नर्सिंग यूनिफॉर्म पहनती हैं तो उनके अंदर एक अलग ही ताकत आ जाती है। उन्होंने बताया, 'यह मेरी वर्दी की ताकत थी, जिसने मुझे खुद से पहले अपने मरीजों के बारे में सोचने की हिम्मत दी। मैं लोगों की मदद किए बिना मरना नहीं चाहती थी।' फर्ज के प्रति यह अटूट निष्ठा अंजलि को विरासत में मिली थी। वे अपने पिता को अपनी सबसे बड़ी प्रेरणा मानती हैं। साल 1979 में जब सांता क्रूज एयरपोर्ट पर भीषण आग लगी थी, तब हर कोई अपनी जान बचाकर भाग रहा था, लेकिन अंजलि के पिता कंट्रोल टावर में अपनी ड्यूटी पर डटे रहे क्योंकि दो विमान लैंड करने वाले थे। उन्होंने उन विमानों को सुरक्षित गाइड किया और उसके बाद ही खुद बाहर निकले। पिता का यही जज्बा अंजलि के खून में दौड़ रहा था।

जब कसाब के सामने आंखें मिलाकर खड़ी हुईं अंजलि

अस्पताल की उस खौफनाक रात को गुजरे अभी कुछ ही हफ्ते हुए थे कि अंजलि को देश के लिए एक और बड़ा फैसला लेना था। पुलिस ने उनसे जिंदा पकड़े गए एकमात्र आतंकी अजमल कसाब की पहचान करने को कहा। अंजलि का परिवार बुरी तरह डरा हुआ था। कसाब की क्रूरता देखकर पूरा देश सहमा हुआ था, ऐसे में परिवार ने उन्हें कोर्ट जाने से रोका, लेकिन अंजलि ने अपने माता-पिता से कहा, 'देश के लिए किसी न किसी को तो आगे आना ही होगा।' अंजलि अदालत में कसाब के बिल्कुल आमने-सामने खड़ी हुईं और बिना किसी हिचकिचाहट के उसकी तरफ उंगली उठाकर कहा कि यही वो कातिल है। इस पर कसाब बेशर्मी से हंसा और बोला, 'मैडम, आपने मुझे बिल्कुल सही पहचाना।' कसाब का वो पछतावा-हीन चेहरा और उसकी कम उम्र देखकर अंजलि हैरान थीं, लेकिन उनकी इस दिलेरी ने कसाब को सजा दिलाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई। इस बेखौफ बहादुरी के लिए अंजलि को बाद में वीरता पदक से भी नवाजा गया।

जख्म जो कभी नहीं भरते

आज इस घटना को करीब दो दशक बीत चुके हैं, लेकिन वो खौफनाक रात आज भी अंजलि के जहन में जिंदा है। वे कहती हैं कि आज भी जब कहीं अचानक पटाखे फूटने की आवाज आती है तो वे सिहर उठती हैं और पल भर के लिए उसी 26/11 की रात में पहुंच जाती हैं। उस हमले ने मुंबई को बहुत गहरे जख्म दिए, जिसमें 166 बेकसूर लोगों की जान चली गई थी, लेकिन 'भारत भाग्य विधाता' जैसी फिल्में हमें यह याद दिलाती हैं कि उस घने अंधेरे में भी अंजलि कुल्थे जैसे इंसानी चिराग जल रहे थे, जिन्होंने अपनी जान दांव पर लगाकर इंसानियत को जिंदा रखा। साहस का मतलब यह नहीं होता कि आपको डर नहीं लगता, बल्कि साहस यह है कि आप डर के आगे घुटने टेकने के बजाय दूसरों की जिंदगी चुनते हैं। अंजलि की यह कहानी देश के इतिहास में हमेशा सोने के अक्षरों में दर्ज रहेगी।

ये भी पढ़ें: 'स्त्री' एक्टर अपारशक्ति खुराना का एक्टिंग से होने लगा मोहभंग, बॉलीवुड छोड़ बनना चाहते हैं टेलर, बताया आगे का प्लान

Latest Bollywood News

Advertisement

India TV हिंदी न्यूज़ के साथ रहें हर दिन अपडेट, पाएं देश और दुनिया की हर बड़ी खबर। Bollywood से जुड़ी लेटेस्ट खबरों के लिए अभी विज़िट करें मनोरंजन